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गरीबी का मजाक

हाल मे मीडिया मे मध्य प्रदेश मे लाभार्थियों के घरों पर " मै गरीब हूँ और मै सरकारी योजना का राशन लेता हूँ"! के लिखे होने पर बवाल मचा हुआ है कि यह गरीबी का अपमान और मजाक उड़ाया जा रह...

छद्म किसान

जो किसानों की मौत पर भोकासी फाड़ के रो रहे हैं, टेसुआ बहा रहे है, उनमे सबसे ज्यादा स्युडो किसान है, छद्म किसान! किसान की सरकारी परिभाषा  मे तो आते हैं पर खेती किसानी से उनका दूर दूर तक नाता नही हैं। इनमें से ज्यादातर तो गूगल और सोशल मीडिया से इतर खेत के बारे मे जानते ही नही। किसानों के सबसे बड़े हमदर्द वो हैं जो कभी नंगे पांव आरी डरेर पर चले नही, कभी खेत की मिट्टी सूंघी नही बल्कि जब गलती से कभी मिट्टी या पांव लग भी गया तो बोलते हैं" ओ शिट्ट"! हम जैसे छद्म किसानों को एक्चुअल किसानों की परेशानी से क्या वास्ता? हम तो सिर्फ जाते हैं अपना हिस्सा बटोरते हैं, सरकारी क्रय केंद्रों या बनियो के आढत पर बेच देते हैं और अपनी जमीन को खेत बनाये रखते हैं। वो जो उस मे बिया लगाते हैं, ट्रैक्टर या हल चलाते हैं, कटनी कराते हैं, वो क्या हैं? सरकारी परिभाषा मे वो किसान ही नही, वो अपनी उपज सरकारी क्रय केंद्रों पर बेच भी नही सकते!वो कृषक बीमा के हकदार नही, वो किसान क्रेडिट कार्ड के हकदार नही, वो किसान के रुप मे किसी भी सरकारी सुविधा के हकदार नही। सूखा राहत मिलेगा तो छद्म किसानों को जो शायद कहीं नौकरी...

कांफिडेंस लेवल की बात है....

" तो दसमी बाद वह जिद पर अड़ गया कि साइंस नही पढेगा। ऐसा नही था कि उसे कम नंबर आया था या वह किसी साइंस विषय  मे कमजोर था या शहर के सबसे अच्छे  कालेज मे एडमिशन नही होता!सिर्फ कुछ  अलग  करने  की  चाहत थी !लीक  से  हटकर  चलना  उसकी  फितरत ! "घर मे सब  साइंस लेकर पढे है तो क्या सब डाक्टर इंजीनियर ही बनेगा? मै तो कामर्स ही पढूंगा।  विपुल ने पापा को समझाया" उसका मैथ बहुत अच्छा नही था और अलजेबरा, त्रिकोणमिति तो समझ ही  नही पाता था, रट्टा मारकर या गेस पेपर पढकर नंबर आ गये थे। " "हालांकि केमिस्ट्री मे नाइंटी सिक्स परसेंट मार्क्स था पर खास इंट्रेस्ट उसमे नही है। बाइलोजी गुरुजी कभी क्लास मे ठीक से पढाये ही नही। जब रिप्रोडक्शन का चैप्टर आता तो बोलते" अपने पढ लेना। लड़कियाँ भी थी क्लास मे ! भला उसके सामने कैसे प्रजनन के बारे मे समझाते? सर जी शर्माते रहे और बच्चे छुपकर और अधिक इंट्रेस्ट लेकर् पढते रहे।                                     ...

कंफ्युजिंग टाइटिल

बिहार मे जगन्नाथ मिश्रा की सरकार को ब्राह्मणों की सरकार कहा जाता था। कहते हैं उस समय सभी डिपार्टमेंट मे ब्राह्मणों की धड़ल्ले से घुसपैठ हुई। यही हाल यादवों का लालू- राबड़ी मे हुआ। कहते हैं नीतीश के जमाने मे वो जोर कुर्मियों का नही है पर स्पेशल अटेंशन तो अवश्य होगा। ऐसा हम नही कह रहे हैं....हमारी जातिवादी सोच कह रही है या हम ऐसी धारणा बना लिए हैं। वास्तव मे ये जातीय लगाव किसी एक खास जाति की बपौती नही है बल्कि सभी इसका रसास्वादन करते रहते हैं ।जब भी मौका मिल जाये, प्यार छलक जाता है। नही भी छलकता है तो हम इतना हिला डुला देते हैं कि छलक जाता है। थोड़ा सेंटी पिलाते हैं, भावनाओं को भड़काते है, साम दाम दंड भेद सब अपनाते हैं पर अपना काम जरूर कराते हैं। यदि न भी मंशा रही हो तो भी हमारी कलम और वाणी मे इतना दम है कि हम  साबित कर देते हैं कि अमुक कार्य तो जातीय प्रेम मे ही हुआ है।भला क्यों न करें? यह हमारा सांविधानिक हक जो है! हम पहले से प्रिज्युडिस हो जाते  हैं कि अब तो इसी जाति का ही काम होगा! अब तो इसी जाति के अफसर हीं पोस्टिंग पायेंगे! अगर गलती से कोई केस निकल भी आया तो पक्के दावे पर ...

जिंदगी का सफर

इस  दुनिया मे एक साथ कई स्तरों पर जीवन का विकास होता रहता है। भारत मे ही हम देंखें तो मुंबई और कालाहांडी-बस्तर की जिंदगी मे तीन सौ सालों का फर्कमहसूस होता है।एक ओर् जहाँ मुंबई- बंगलौर के हाई फाई सोसायटी बाइसवीं सदी मे जी रही है तो लखनऊ - चंडीगढ़ इक्कीसवीं सदी मे, तो दरभंगा- फैजाबाद बीसवीं सदी मे, बस्तर- कालाहांडी तो अभी अठारहवीं सदी से निकलकर उन्नीसवीं सदी के जीवन स्तर् मे आने के लिए जद्दोजहद कर रही है।जरा नजर उठा कर देखें तो एक शहर मे ही लोगों के जीवन स्तर मे सदियों का फर्क मिल जाएगा। हाथों की उंगलियों के समान लाइफ स्टाइल बड़ा- छोटा- मोटा- पतला होता है पर मुठ्ठी बंद हो जाये तो देश और समाज बन जाता है।इसी तरह कभी कभी आप अपनी जिंदगी से निराश हो जाते हैं।" क्या बेकार जिंदगी जी रहा हूँ मै! ये जीना भी कोई जीना है लल्लू!",जबकि दुनिया में उसी समय कुछ लोग आपकी जैसी जिंदगी जीने का सपना देख रहे होते हैं।" काश मै भी उसकी तरह जी पाता"! अपनी जिंदगी से कोई संतुष्ट नही होता। " दूर के ढोल सुहावन लागे!" परायी जिंदगी और परायी स्त्री सबको अच्छी लगती है क्योंकि प्रोब्लम तो पा...

गछपकुआ आम

जतिन गाना  सुनते  सुनते यादो के  समन्दर  मे  गोते  लगाने  लगा  था! गांव  मे खेत मे जब मजदूर काम करते थे उसका " पनपिआई"(नाश्ता) लेकर खेत-बाद मे जाता था! पनपिआई का स्वाद अद्भुत और गजब का होता था। मोटी मोटी रोटियां, प्याज-नमक-तेल- अचार का राई और कभी कभी थोड़ी सब्जी! लेकिन उसको खाने का मजा ही कुछ और था!वह अपने लिए भी पनपिआई रख लेते और खेत मे जाकर " हरवाह" के साथ आरी-डरेर पर बैठकर खाते।इसमें अप्रतिम आनंद आता। आज भी उसके बारे मे सोचकर ही मुंह मे पानी आ जाता है। एक बार गेंहू के खेत मे पानी पटवाने "सरेह"(दूर का खेत) मे गया था। लौटते वक्त शाम हो गई तो डर से अकेले इसलिए नही वापस आ रहा था कि रास्ते मे पड़ने वाले एक सीम्मर गाछ पर भूत होने के किस्से सुनने को मिलता था। जब दो- तीन लोग वापस आने लगे तो साथ हो लिया। शाम का धुंधलका हो चला था। सीम्मर गाछ से थोड़ी दूर पहले वे लोग थे तो दूर से कोई आता दिखा। थोड़ी देर मे वह साया दो हो गया तो सबके कान खड़े हो गये। जो सबसे बुजुर्ग था ,उसकी हिम्मत भी जबाब देने लगी थी जब वहाँ तीन साया दिखने लगा। सबलोग आगे बढ रहे थे पर उन...

ट्रांसफर

"इ सब का है हो चंदेसर? ट्रांसफर के नाम से एतना डर काहे जाते हैं?का नोकरिया इ सोच के किए थे  सभे दिन घरे में रहेंगे ?एकदम्मे भगदड़ मचा के छोड़ेंगे का?अरे बहुत  लोगन के धंधा पानी चल ...