बाबुल मोरा नैहर छुटल जाए


जतिन सारेगामा कारवाँ पर गाना सुनते-सुनते यादों के समंदर में गोते लगाने लगा था ! "कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन बीते हुए दिन वो प्यारे पल छिन।"

असल में यह रेडियो का सब्स्टीट्यूट बनकर आया है। अब उसके ज़माने के विविध भारती और ऊर्दू सर्विस के गाने हों या सिबाका गीतमाला, सबको एक जगह संजोकर लाया है। हजारों गाने हैं, जो जतिन को हमेशा गाँवों की उन गलियों में ले जाते, जहाँ उसका बचपन बसा था।

ओफ्फो ! वे दिन भी क्या दिन थे ! गाँव में खेत में जब मजदूर काम करते थे, तो उनका 'पनपिआई' (नाश्ता) लेकर खेत-बाद में जाता था! पनपिआई का स्वाद अद्भूत और ग़जब का होता था। मोटी-मोटी रोटियाँ, प्याज, नमक, तेल और अचार का राई और कभी-कभी थोड़ी सब्जी ! लेकिन उसको खाने का मजा ही कुछ और था ! वह अपने लिए भी पनपिआई रख लेता और खेत में जाकर 'हरवाह' के साथ आरी- डरेर पर बैठकर खाता। इसमें अप्रतिम आनंद आता। आज भी उसके बारे में सोचकर ही मुँह में पानी आ जाता है। जब भी वहीं गाँव जाता है, उन जगहों पर जाकर उन यादों को ताजा करता है। बड़े प्यार से अपने बच्चों को दिखलाता है कि यहाँ ये हुआ था। उसने बताया कि एक बार गेहूँ के खेत में पानी पटवाने 'सरेह' (दूर का खेत) में गया था। लौटते वक्त शाम हो गयी, तो डर से अकेले इसलिए नहीं वापस आ रहा था कि रास्ते में पड़ने वाले एक सीम्मर गाछ पर भूत होने का किस्सा सुनने को मिलता था। जब दो-तीन लोग वापस आने लगे, तो साथ हो लिया।शाम का धुंधलका हो चला था। सीम्मर गाछ से थोड़ी दूर पहले वे लोग थे, तो दूर से कोई आता दिखा। थोड़ी देर में वह साया दो हो गया, तो सबके कान खड़े हो गये। जो सबसे बुजुर्ग था, उसकी हिम्मत भी जवाब देने लगी थी, जब वहाँ तीन साया दिखने लगा। सब लोग आगे बढ़ रहे थे, पर उनके पैर साथ नहीं दे रहा थे।

सभी बुरी तरह डरने लगे थे। जब सायों की संख्या चार हो गयी, तब तो सभी की हिम्मत जवाब दे गयी और वे पीछे की ओर चिल्लाते हुए भागना शुरू कर दिये। खेतों में पानी पटा होने के कारण कीचड़ था। कहाँ चप्पल गया, कहाँ बाल्टी, कहाँ कुदाल, पता नहीं? पंपिंग सेट का इंजन इतना तेज बज रहा था कि उसके पास खड़े लोगों को उनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी। जब वे गिरते-पड़ते, वहाँ पहुँचे तो वो लोग भी कहने लगे, "अरे! अच्छा किये, नहीं गये! यह ब्रह्म पिशाच के निकलने का समय है।"

हमलोग सोचे, 'जान बची तो लाखों पाये।' अब सब साथ में ही घर जाएंगे। थोड़ी देर बाद वहाँ बैठे ही थे, तो दिखायी पड़ा कि कुछ दूर आगे रजेसवा का पंपिंग सेट चल रहा था, उसकी माँ, दोनों बहन और भाई, उसके लिए रात का खाना लेकर जा रहे हैं। तब पता चला कि असल में जो दिखायी पड़े थे, वो ये ही लोग थे। शाम के धुंधलके में एक सीध में आरी पर चलते होने के कारण पहला वाला ही शुरू में दिखायी दिया और जैसे-जैसे वो लोग टेढ़े-मेढ़े आरी पर चलते आये, अगल-बगल दिखने लगे थे।

ये तो अच्छा हुआ कि भ्रम उसी समय खत्म हो गया, वरना जिंदगी भर ये सोचते रहते कि हमने भूत-पिशाच देखा था और बाल-बाल बचे थे! गाँव में भूत-प्रेत का प्रकोप और किस्सा-कहानी ज्यादा चलता है।

जतिन सोचने लगा कि रात में भ्रम भी ज्यादा होता है। कैसे एक बार जब वह काफी दिनों के बाद जब गाँव गया था, तो केले के लंबे चमकते पेड़ को भूत समझ लिया था। हवाओं के चलने से डोल रहे उसके पत्ते भूत के हाथों के समान उसे बुला रहे थे। रात भर वह दलान पर 'गब्दी' मारे सोता रहा। सुबह किसी को कहता, उससे पहले पता चला, वो केला का पेड़ था।

आम के दिनों में गाछी पर से गिरे 'गछपकुआ आम' खाने में काफी अच्छा लगता था। एक आम जहाँ टप्प से गिरता, सभी बच्चे एक साथ उसे लूटने दौड़ जाते। आम को चोभ्भा मारकर खाने से स्वाद बढ़ जाता था। आम की 'आंठी' (गुठली) चाटकर किसी पेड़ के खोखर में रखते और जोर से बोलते, "हे कोयली माता आम गिराओ !"

कभी-कभी सच में कोयली माता बच्चों की सुन भी लेती थीं। जामुन खाकर रंग में रंगे जीभ को एक-दूसरे को दिखाते, तो कभी आइने में देखकर खुद ही खुश होते। आम के दिनों में जब अंधड़-बयार चलता तो झोरा-बोरा लेकर

'गुधनी' (आम का बगीचा) की ओर रात-बिरात भागते, अंधेरे में भी अपनी गाछी केनीचे पानी, डबरा, खत्ता, कीचड़ में आम और 'टिकोला' (आम का बच्चा) हंसोरते। जाते वक्त तो उस सुनसान अंधेरी रातों में तो गाछी में चले जाते थे, पर आते वक्त उसे बहुत डर लगता था।

जाने वक्त का जोश समाप्त हो जाने पर 'जय हनुमान ज्ञान गुणसागर' और जय महरानी जी, जय बरहम बाबा के जाप करते घर लौटते। रास्ते भर इधर-उधर नजर नहीं घुमाते कि कहीं कोई डायन, चुड़ैल, भूत-पिशाच या ब्रह्म पिशाच न दिखायी पड़ जाये। वापस घर पहुँच कर जान में जान आती थी।

अचानक दरवाजे पर पड़ी दस्तक से वह चौंका! तारतम्य भंग हो चुका था ! दरवाजा खोला, तो सामने कशिश खड़ी थी, "आज आफिस नहीं जाना है क्या?" "नहीं! माँ को गाँव जाना है न! स्टेशन छोड़ने जाना पड़ेगा।"

हालांकि पिछले कई सालों से जतिन माँ को कह रहा है कि "छोड़ दे माय ! अब छठ व्रत तुमसे नहीं हो पाएगा। हमलोग चाहकर भी आ नहीं पा रहे हैं और कब तक डाला चंगेरा उठाने के लिए दूसरों से खेखनिया करती रहोगी...।"

सरसती आज नवरात्रि के बाद हमेशा की तरह गाँव जा रही थी।

"न बबुआ ! जब तक डेग चल रहा है न, आ देह में ताकत है, तब तक छठी मईया का पूजा तो नहिए छोड़ेंगे। तुम लोग आओ न आओ! पूजा तो हो ही जाता है, बस प्रसादी खाने बखत रुलाई आ जाता है कि नेना-भुटका लोग रहता, तो परसादी खिलाकर संतोष हो जाता।"

सरसती कहाँ मानने वाली थी! जतिन को याद आया कि एक बार किस तरह बुखार से मैया की हालत खराब हो गयी थी, पर वो दवा खाने को तैयार नहीं हुई। सारी रात सभी लोग बकरी के दूध में कपड़ा भिगा-भिगाकर पट्टी देते रहे और राम-राम करते रहे कि किसी तरह रात कटे। वो अस्पताल में भर्ती होने को तैयार न थी। अंत में छठी मैया की ही कृपा से भोरवा अरग भी सरसती ने पानी में उतर कर दिया था। पूजा के साथ-साथ बुखार भी खतम हुआ। सब कह रहे थे कि छठी मैया सत्त की परीक्षा ले रही थीं। सत्त की परीक्षा में सरसती पास हो गयी थी।

"तुम तो जिद्दी हो ! मानोगी थोड़े न ! हमको छुट्टी मिलती नहीं है, तो यहीं पर पूजा कर लिया करो ! यहाँ भी तो अब बहुत लोग पूजा करने लगे हैं।" जतिन ने अंतिम अस्त्र फेंका, जिससे मैया जाने की जिद छोड़ दे। पर सरसती कहाँ मानने वाली थी। उसके पास तो जैसे हरेक सवाल का जवाब था।

"अरे! यहाँ कहाँ उतने नेम-निष्ठा से पूजा होता है। बड़ा कठिन व्रत है और उतने ही साफ-सफाई भी। थोड़ा भी चूक हुआ, तो तुरंते दंड भी मिल जाता है। जो चीज सब चाहिए, यहाँ नहीं मिल पाएगा। ना, यहाँ नहीं करेंगे। हमेशा मन में खुटका लगा रहेगा कि पता नहीं क्या गलत हो जाए! मैं तो जा रही हूँ।" सरसती हरेक साल की तरह चली गयी।
जतिन हमेशा की तरह छठ पूजा तक तड़पता रहता है। यही तो एक पूजा है, जिसमें वो हरेक साल जाता था, पर पिछले तीन साल से चाहकर भी नहीं जा पा रहा है।

हूक तो उठती है, पर बयां किससे करें। कमबख्त नौकरी है ही ऐसी कि छठ पूजा के समय काम भी बढ़ जाता है। छुट्टी माँगो, तो भवें तन जाती हैं। दीवाली में चार दिन छुट्टी मना के आये हो, फिर चाहिए? कौन कहे कि सरकार ! दीवाली में यहीं बैठा लो पर छठ में छुट्टियाँ दे दो! पर कौन पसीजता है।

जतिन जैसे गाँवबदर हो गये। परदेसियों के लिए 'छठ पूजा' एक एलमुनी मीटिंग के समान है जिसमें आस्था, भावना एवं धार्मिक सम्मिलन के साथ-साथ गाँव के छूटे-छपाटे काम करना, बिछड़े चेहरों को देख-दिखाकर रिफ्रेश करना गाँव में अपनी पहचान बनाये रखने का सर्वोत्तम अवसर के रूप में देखा जाता है। जतिन को लगता था कि कई सालों के बाद यदि कहीं अचानक गाँव पहुँचे, तो इतने अनजान चेहरे दिखायी पड़ेंगे, जिनको न तो वो पहचानता होगा और न वे उसको।

अभी पिछले साल उसके आफिस में शरद ने ज्वाइन किया था, पर उसके बारे में उसे पता तक नहीं था कि वो भी उसी के गाँव का है और रिश्ते में भतीजा लगेगा क्योंकि शरद कभी भी बिरजू भैया के साथ गाँव नहीं गया और जतीन ने उसे कभी देखा भी नहीं था। यदि उस दिन ऑफिस के बाहर उससे मिलने आये बिरजू भैया से मुलाकात न होती, तो वो ये जान भी नहीं पाता। कितना अजीब है कि इतने करीब के रिश्तों के शक्ल अनजान हो जाते हैं क्योंकि हम अपने जड़ों से कट जाते हैं।

सरसती अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहती है। छठ पूजा, होली, दीवाली और शादी- ब्याह तो बस एक बहाना है। सबसे मिलने का और रिश्तों की गर्मजोशी बनाये रखने का, जतिन हरेक बार 'ना' करता रहता है, पर दीवाली के अगले दिन बच्चों और पत्नी को गाँव भेज ही देता है। सरसती भी मन ही मन जानती है कि जब तक हम जिंदा हैं, तभी तक ये लोग हमारे बहाने गाँव आएंगे और अपनी जड़ों से नहीं कटेंगे। "माय ! बच्चा सब के भेज दिये हैं! अकेले कैसे कर पाओगी !"

"तूहो एक्को दिन के लिए चले आओ! संझिया अरग के दिन आकर, अगले दिन परना के परसादी खा के चले जाना।"

"एकदम्मे फुरसत न है माय !"

माँ का दिल कहाँ मानता है। अंतिम समय तक आस लगी रहती है, शायद बेटा आ जाये ! डाला उठाने के समय तक दरवाजे पर आँखें टंगी रहती हैं। शायद सरप्राइज मिल जाये।

"क्या करें माय ! बहुत दूर हैं! उड़ भी तो नहीं सकते न!" आज संझिया अरग है और जतिन सुबह से बेचैन है। क्या हो रहा होगा वहाँ पर? कशिश को वीडियो कालिंग करता हूँ और घाट पर सबको देखता हूँ। आँखें तरस गयी हैं वो सब देखने को।घाट से आते ही माय डलिया, कुड़वार और ढकिया में जो प्रसाद छठी माई को अर्घ्य दी होती है, उसको उसरगती है और सभी को मिलाकर प्रसाद देना शुरू कर देती है। भले ही अपने व्रत में दो दिन की निर्जला उपवास की होती है, पर सबको प्रसाद खिलाने के बाद ही अपने मुँह में अन्न रखेगी। जैसे खरना के दिन का मिट्ठा (गुड़) वाला खीर का स्वाद बिसरते नहीं बनता है, उसी तरह आज सुबह-सुबह ठेकुआ, कसार, लड्डू, खाजा का पंचमेड़, खजूरी खाकर मस्त हो जाता हूँ। असल में जो स्वाद इस समय का होता है, भले ही बाद में आप कितनी बार गुड़ की खीर बनवा लो, वह स्वाद नहीं आ पाता। यह स्पेशल है इस पर्व में ! हाथी (मिट्टी का) के ऊपर जो ऊख टंगा रहता है ऊ में से माली कहेगा, "हमको एक दे दीजिए!"

माय कहती है, "तू सब तो गाँवे में रहते हो, खाने दो इन सबको, ये लोग फिर ऊख कहाँ पाएगा?"

वो बेचारा ऊख को बाँधने में उपयोग किया गया, चनमा लेकर संतोष कर लेता है। हम ऊख को लेकर पालथी मारकर बैठ गये। छीलने में मसूड़ा छिल जाता है, खाने की आदत छूट जो गयी है। याद आता है स्कूल का वो दिन, जब हमलोग बैलगाड़ी पर लदे ऊख के पीछे-पीछे दौड़ते रहते थे और गाड़ीवान के आँखों से जरा ओझल हुए कि ऊख का लग्घा खींचकर यह ले, वो ले... पार! एक बार एक गाड़ीवान हम सबको ताड़े हुआ था, जैसे ही हमलोग ऊख का लग्घा खींचे कि उसने जोर से घुमाकर बैल को हाँकने वाला डंडा फेंक कर मारा, एक लड़के का लोल (होंठ) फट गया। उस समय तो सब भाग लिये, लेकिन उसके लोल को सिलवाना पड़ा। हम सब काफी सालों तक उसे 'लोल चिरी' कहकर चिढ़ाते रहे।

सुरसती को लगता है, परदेशिया बेटा-पुतोहू सब आये हैं, उसको क्या-क्या खिलाये, पर इन्हें रहना कितने दिन है? "नहाय खाय से एक दिन पहले तो आये हो और आते ही कहने लगते हो, परना के दिन जाना है, तो आते क्यों हो? साल में एक बार तो आते हो। इससे भला आते ही नहीं। अब तो अगले साल से व्रत ही छोड़ दूँगी। किसके लिए करती हूँ। तुम्हीं लोगों के लिए न। आओगे नहीं, तो बच्चा सब प्रसाद क्या खाएगा!"

रोने लगती है! जितनी तैयारी आने से पहले होती रहती है, जाते वक्त गाँव छोड़ना वाकई अखरता है। छठ के दो-तीन महीना पहले से प्लानिंग बनना शुरू हो जाता है, ये सब ले जाएंगे, गाँव का फलाना काम भी निपटा लेंगे। मिसेज बोलेगी, "लहठी इधर नहीं मिलता है, इस बार तीन जोड़ी लेते आएंगे।" नहाय खाय से एक दिन पहिले पहुँचेंगे, उस दिन जाएंगे तो माय पूजा की तैयारी करेगी कि हम लोगों का आगत- स्वागत ! हमलोग पाहुन बनकर थोड़े न हंकार पूजने जा रहे हैं।

छठ में इतना काम होता है, गंभरी का धान सुखाना, कूटना, फिर साफ कर पिसाना। उसी का भूसवा बनता है। अरे! याद आया भूसवा को दूध में डालकर केला मिलाकरखाओ ! इतना स्वादिष्ट की सीधे स्वर्ग में पहुँच जाओगे ! अप्रतिम आनंद ! गंभरी स्पेशल धान होता है, जिसका उपयोग सिर्फ पूजा के कार्यों में ही होता है। अब लोग इसकी खेती कम करने लगे है, छठ में इसके डिमांड के चलते इसका भाव भी दुगूना- तिगुना हो जाता है। पहले तो इसे ढेंकी में कूटते और जांता में पिसा जाता था। उस समय गाँव-घर की काकी, दाई सब मेरे घर में दोपहर बाद जुटती थी। जब सब अपने घर के मर्दों को खाना खिला देती थी, निश्चिंत होकर आती और गीत गाते हुए ढेंकी चलाती, लगता त्योहार के दिन आ गये हैं। कोई इसी बीच में चावल उसकाती रहती, कोई दो मिलकर जांता में पिसाई भी करती रहती। यह सब सामूहिक रुप से पर्व मनाने का जरिया था। अब तो चक्की में पिसाते-कुटाते हैं। सब एक-दूसरे घर जाने से परहेज करता है और ढेंकी-जांता चलाने का मेहनत भी कौन करें? इसी से तो इतनी बीमारी बढ़ रही है। सिलौट तो अभी भी शहर-गाँव में दिख जाता है, पर ढेंकी-जांता तो विलुप्त हो गये।

तो छठ ऐसा उत्सव है, जिसमें सब अपने गाँव जाना चाहते हैं, सभी बाहर रहने वालों और ग्रामीणों से मुलाकात हो जाती है। हमारी असली पहचान तो वहीं से है न, जहाँ हमें लोग हमारे नाम, पिता, दादा के नाम से जानते हैं। आज-कल ओहदे को भी महत्व देने लगे हैं, गाँव वाले तो दो चार दिन में ही, चौक पर जाना, लंगोटिया मित्रों से मिलना, रोड पर मूढ़ी-कचरी और कच खाना, काकी और भऊजी लोगों से मिलना, दरवाजा पर बैठकी करना, घाट सजाना, सब करना होता है, एकदम्मे फुरसत नहीं होता। मिसेज बार-बार बच्चों को दरवज्जा पर भेजकर 'खाना खा लीजिए, तब बैठकी आ गप्प सरक्का करिएगा' का संदेशा भिजवाती रहती है, कई बार दरवाजे का पल्ला जोर से हड़हड़ाने पर उठकर खाना भी खा लेते हैं। रात में कशिश से सुनना भी पड़ता है, "बड़ा मजा आता है, भउजी सबसे हँसी ठहाका करने में। यहीं रह जाइए।" हम मुस्कुरा कर कहते हैं, "क्यों जलती हो? यहाँ बंधन में जो पड़ी हो! घर से बाहर तो निकल सकती हो ! कुछ दिन तो आजाद महसूस करने दो !" धमकी नजरों से भी मिलती है, "चलो वहाँ लखनऊ, तब बताती हूँ।"

"हह..हा..! मैं तो मजाक कर रिया था!"

तो कितना जल्दी जाने का दिन आ जाता है। बच्चों को भी यहाँ अच्छा लगता है। दादाजी कह रहे हैं, आज रुक जाओ! रुक जाते है! फिर तो अगले साल ही आना है! क्या बताऊं बच्चों को! जाना कौन चाहता है? परना के अगले दिन भोरे-भोर ट्रेन पकड़ना है। दोपहर बाद पैकिंग चालू। कहीं कुछ छूटा तो नहीं !

"जाने दो कुछ छूट जाएगा तो तुम जब आना तो लेते आना।" माय को बोलता हूँ तो बोली भरी जाती है। न जाने कैसे इन मौकों पर आँखों में बिना बात के पानी आने लगता है। लगता है जैसे कि 'बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए!' मायका सिर्फ लड़कियों का नहीं छूटता, आज-कल लड़के भी गाँव छोड़कर अपने नौकरी पर जातेवक्त कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं। जो ट्रीटमेंट टिपिकल ससुराल में बहुओं के साथ होता है, उससे कम लड़कों के साथ आफिस या फैक्ट्री में थोड़े न होता है !

हम बैग में बच्चों के कपड़े सहेज रहे होते हैं, तो माय एक मोटरी में ठेकुआ, खजूरी, सठौरा (भूसवा), टिकरी, मिठाई आदि बांधकर ले आती है।

"इसे रख लो परसाद है, खा लेना और अपने दोस्तों-पड़ोसियों को भी दे देना ! ज्यादा सामान ले तो जाओगे नहीं! नवका धान का चूड़ा कूटवाये हैं, आधा बोरिया लेते जाओ, शहरी चूड़ा में वो स्वाद और मिठास कहाँ है? चूड़ा-दही और नवका गुड़ की भेली ! आत्मा तृप्त हो जाती है।'

अचानक दरवाजे पर जोर से खटखटाहट हुई, तो आँखें खुल गयीं और मैं उठ बैठा ! तो सपना देख रहा था मैं। इस साल तो मेरे ससुराल (ऑफिस) वालों ने नैहर जाने का मौका ही नहीं दिया। सपना भले ही था, पर आँखों में पानी असली था। उधर माय के आँखों में होगा, जो परसाद बाँट रही होगी टोला-मुहल्ला में ! और एक हाथ से अंचरा से बार-बार नोर भी पोंछ रही होगी।

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