विधायिका के अहं पर चोट

बिहार विधान सभा के अध्यक्ष श्री विजय चौधरी ने लोक सभा अध्यक्ष श्री मती सुमित्रा महाजन को पत्र लिख कर विधायिका के अधिकार क्षेत्र मे पुनः न्यायपालिका के हस्तक्षेप का मुद्दा  उठाया है।उन्होंने हाल के उतराखंड विवाद मे विधान सभा मे बहुमत परीक्षण का कार्य माननीय उच्चतम न्यायालय के नामित प्रशासनिक अधिकारी के निरीक्षण मे कराये जाने पर सवाल उठाते हुए लिखा है कि इससे विधायिका की गरिमा और प्रतिष्ठा का हनन हुआ है।वास्तव मे उनकी वेदना जनप्रतिनिधियों की अहं को दर्शाता है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और उन पर कोई नियंत्रण नहीं कर सकता।उससे भी ज्यादा चोट इस बात से लगी है कि एक बाबू(आइ ए एस को शासन मे बाबू कहते हैं) ने उनके बहुमत परीक्षण का पर्यवेक्षण किया, यह सीधे सीधे मर्मस्थल पर आघात है, परंतु वो भूल रहे है कि संविधान सर्वोपरि है और न्यायालय उसका संरक्षक है।विधायिका की गरिमा स्वयं उसके सदस्यों ने गिराई है।वाकई मे भारतीय जनता कभी कभी उनके व्यवहार, सोच और सदनों मे वक्तवव्यो और कृत्यों को देखकर हतप्रभ रह जाती होगी कि क्या हमी ने इन्हे चुना है? सदन मे गाली-गलौज, मार-पीट, कुर्सी-टेबल आदि फेंकना, मोबाइल पर अश्लील वीडियो देखना, वोट की खरीद-बिक्री सभी कुकर्मो को जनता देख चुकी है।विधायिका हमेशा से अपने वर्चस्व के प्रति सजग और सचेत रही है और न्यायपालिका ने जहां भी  हस्तक्षेप किया, नए कानून को बना डालती है।भारत मे जनता का शासन है और उनके प्रतिनिधि कुछ भी कर सकते हैं पर यह उतराखंड का मामला न्यायालय मे कौन ले गया? स्वयं विधायक और बाद मे मुख्यमंत्री।यानि उन्हें भी न्याय की आशा न्याय पालिका से ही थी।सदन के अध्यक्ष अब सदन का नहीं पार्टी के नुमाइंदे बतौर कार्य  करने लगे, तो गरिमा घटेगी ही।पतन सब जगह हुआ है,पहले राज्यपाल राज्य का सांविधानिक प्रथम और राष्ट्रपति का राज्य मे प्रतिनिधित्व किया करता था ,परंतु अब वह राज्य  मे केन्द्र सरकार की सतासीन दल की नुमाइंदगी भर करता है और राज्य सरकार के कार्यों मे बिलावजह हस्तक्षेप करता रहता  है। चौधरी साहब इसपर देशभर के विधान सभा अध्यक्षों की बैठक बुलाने की गुजारिश करते हैं।आवश्यकता है कि इस बैठक मे वो आत्मविवेचना एवं आत्मालोचना करें कि विधायिका की लगातार गिरते जा रहे स्तर और गरिमा को कैसे उपर उठाया जाय ?

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